गोपालगंज से कोलकाता का सफर तय करने वाले टीम इंडिया के खिलाड़ी Mukesh Kumar की कुछ ऐसी है कहानी

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 150 किलोमीटर दूर गोपालगंज जिले के एक छोटे से गांव कुकरकुंड के Mukesh Kumar रहने वाले हैं। बचपन से ही उन्हें इंडियन टीम में खेलने का शौक था, लेकिन वहां खेल के इंफ्रास्ट्रक्चर ना मौजूद होने के कारण मुकेश कुमार के लिए यह पॉसिबल नहीं था।

लेकिन ऑस्ट्रियन न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रायड द्वारा कहा गया है कि “किसी दिन वर्षों का किया हुआ संघर्ष बहुत ही खूबसूरत तरीके से तुम्हें आगे बढ़ाएगा”

साउथ अफ्रीका के खिलाफ वनडे सीरीज के दौरान पहली बार टीम इंडिया का हिस्सा बने तेज गेंदबाज मुकेश कुमार द्वारा फ्रॉयड कि इस बात को सही साबित किया गया।

अपनी मेहनत और खेल के प्रति अपने लगाव को मानते हैं, अपनी कामयाबी का कारण

मुकेश का कहना है, कि मेरा बचपन से सिर्फ एक ही सपना था, कि मैं किसी दिन अपने भारत के लिए खेलूं। मुझे यह बात नहीं मालूम थी कि आखिर मैं इतने बड़े सपने को कैसे पूरा कर सकूंगा। लेकिन मैं जिस टीम के लिए खेलता था, बस मुझे हमेशा यही कहा जहां जाता था, कि हमेशा अपनी गेंदबाजी और विकेट पर ध्यान दो। मैंने बस उन्हीं की बात सुनकर उतना ही किया, और आज अपनी मेहनत और लगन के चलते मैं इस मुकाम तक पहुंच पाया।

क्रिकेट के पक्ष में नहीं थे पिता

जब उनसे इस बात के बारे में पूछा गया कि आप सीआरपीएफ में जाना चाहते थे, और आपके पिताजी आपके लिए क्रिकेट के पक्ष में नहीं थे तो इस बात पर उन्होंने कहा कि नहीं यह बात सही नहीं है।

मेरे पिताजी क्रिकेट को लेकर मेरे खिलाफ नहीं बल्कि उसके बहुत बड़े फैन थे। बस बात सिर्फ इतनी थी कि हमारी आर्थिक स्थिति सही ना होने के कारण पिताजी को विश्वास नहीं था, कि किसी छोटे शहर का लड़का भी क्रिकेट में इस मुकाम तक पहुंच सकता है।

उनका बस यही कहना था कि मन लगाकर पढ़ाई करो और उसके बाद नौकरी करो। क्योंकि इतनी छोटी सी जगह का लड़का क्रिकेट में अपना कैरियर बनाने में सफल नहीं हो पाएगा। लेकिन मैंने उन्हें विश्वास दिलाया और मैंने उनसे थोड़ा समय मांगा। फिर मेरे लगातार कठिन परिश्रम करने से 2 साल बाद जब मेरा रणजी ट्रॉफी की लिस्ट में नाम आया, तो मैंने सबसे पहले यह खबर अपने पिताजी को ही सुनाई।

काफी संघर्षों से गुजरा जीवन

मुकेश का जीवन काफी संघर्ष भरा रहा उनके पिताजी का साया भी उनके सर से उठ गया। लेकिन फिर भी पूछे जाने पर कि क्या इस खिलाड़ी ने क्रिकेट से अपने कदम डगमगाए तो उन्होंने जवाब में कहा कि रणजी ट्रॉफी में चयन के बाद मुझे कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि आप मुझे क्रिकेट छोड़ना चाहिए।

कैसे पड़ा ब्रेट ली नाम

बिहार के लोकल ग्राउंड में खेलते समय लोग उनको ब्रेट ली कहकर बुलाते थे। लेकिन उनका यह नाम कैसे पड़ा सुनिए उनकी जुवानी

उन्होंने कहा उस समय में टेनिस बॉल से क्रिकेट खेलता था, और गेंदबाजी भी बहुत तेज करता था। मेरे एक्शन भी ब्रेट ली से काफी मैच करते थे। मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूं और उन्हें अपना आदर्श मानता हूं और जब मुझे लोगों के द्वारा ब्रेट ली कहकर बुलाया जाता था। तो मुझे बहुत अधिक खुशी होती थी।

कैसे तय किया गोपालगंज से कोलकाता का सफर

उन्होंने कहा कि कोलकाता में मेरे पिता का छोटा सा बिजनेस था और मेरे पिताजी ने मुझे बिजनेस करने के लिए ही कोलकाता बुलाया था। उनका कहना था कि यहां पर आ जाओ और कुछ काम में लग जाओ। लेकिन मैंने वहां पर क्रिकेट क्लब ढूंढना शुरू कर दिया, और कुछ दोस्तों की मदद से मैं वहां तक पहुंच भी गया, जहां मैंने सेकंड और फर्स्ट डिवीजन खेला और 2020 के दौरान मेरा चयन रणजी ट्रॉफी में हो गया। सही मायने में मेरी क्रिकेट जर्नी की शुरूआत वहीं से हुई।

बंगाल क्रिकेट और BCCI का मिला सपोर्ट

सबसे पहले तो मैं यही कहूंगा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मेहनत पर भरोसा होना चाहिए बिना खुद पर विश्वास किए कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है।BCCI और (CAB) को मैं बहुत अधिक धन्यवाद देना चाहता हूं, कि बिहार जैसे शहर के लड़के को भारतीय टीम में जगह दी। क्योंकि क्रिकेट का वहां पर इतना अधिक स्कोप नहीं है। मात्र डोमेस्टिक क्रिकेट के दौरान की गई अपनी परफॉर्मेंस से मेरा भारतीय टीम में चयन हो गया।

आईपीएल की नीलामी के दौरान कौन सी टीम की तरफ से खेलने पर किए गए सवाल पर उन्होंने कहा, कि मुझे जिस टीम की तरफ से खेलने का मौका मिलेगा, मैं उसकी तरफ से ही खेलूंगा।

इसके साथ-साथ उन्होंने कहा कि मैं बहुत अधिक खुश हूं कि मुझे शार्दुल ठाकुर, शिखर धवन और श्रेयस अय्यर जैसे खिलाड़ियों की टीम में खेलने का अवसर प्राप्त हुआ है।

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